🏰 रणथम्भौर के चौहान: वीरता, बलिदान और गौरवशाली इतिहास
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🏔️ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: रणथम्भौर दुर्ग का सामरिक महत्व
रणथम्भौर दुर्ग राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में स्थित एक अभेद्य पर्वतीय दुर्ग है। यह अरावली पर्वत श्रृंखला की एक चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है और चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है। इस दुर्ग का सामरिक महत्व इसलिए अत्यधिक था क्योंकि यह उत्तर भारत को मालवा, गुजरात एवं दक्षिण भारत से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों के मध्य स्थित था।
रणथम्भौर दुर्ग का निर्माण सबसे पहले 8वीं शताब्दी में चौहान वंश के शासकों ने करवाया था। बाद में यह दुर्ग मुस्लिम आक्रांताओं (गुलाम वंश एवं खिलजी वंश) और राजपूतों के बीच संघर्ष का केंद्र बना रहा। इस दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस पर सबसे अधिक बार आक्रमण हुए और हर बार राजपूतों ने अदम्य साहस का परिचय दिया।
🗿 रणथम्भौर में चौहान शासन की स्थापना
तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद उनके पुत्र गोविंदराज चौहान ने सर्वप्रथम रणथम्भौर में चौहान वंश की नई शाखा स्थापित की। गोविंदराज ने दिल्ली सल्तनत के दबाव के कारण रणथम्भौर को अपनी राजधानी बनाया और यहाँ से चौहान शासन पुनः संगठित किया।
⚔️ वीर हम्मीर देव चौहान (1282-1301 ई.) – अदम्य शौर्य के प्रतीक
हम्मीर देव चौहान (हम्मीर देव / हम्मीर देव प्रथम) रणथम्भौर के चौहान शासक सक्रदेव के पुत्र थे। इनके शासनकाल में ही रणथम्भौर ने अपने गौरव के चरम को छुआ। ये अपनी दिग्विजय नीति, दूरदर्शिता एवं अद्भुत वीरता के लिए जाने जाते हैं।
🏹 हम्मीर देव चौहान के 17 युद्ध (16 में विजय)
प्रमुख विजय अभियान: इन्होंने अपने जीवन में कुल सत्रह (17) युद्ध लड़े, जिनमें से सोलह (16) युद्धों में विजय प्राप्त की। ये “जीत का वरदान पुत्र” जैसी उपाधियों से विभूषित थे।
- मालवा के परमार शासक – पराजित किये।
- गुजरात के वाघेला शासक (सारंगदेव) – पराजित किये।
- मेवाड़ के गुहिल शासक – पराजित किये।
- हाड़ौती के हाड़ा चौहानों – अधीनता स्वीकार कराई।
📜 धार्मिक एवं सांस्कृतिक योगदान
हम्मीर देव ने पण्डित विश्वभट्ट (विश्वरूप) के नेतृत्व में “कोटी यज्ञ यज्ञ” (कोटि यज्ञ) करवाया। यह एक विशाल यज्ञ था, जिसमें एक करोड़ आहुतियाँ दी गईं। यह उस समय के हिन्दू शासकों में धार्मिक आस्था और साम्राज्य शक्ति का प्रतीक था।
इनके दरबारी कवि नयनचन्द्र सूरी ने प्रसिद्ध ग्रन्थ “हम्मीर महाकाव्य” की रचना की, जिसमें हम्मीर देव की दिग्विजयों और पराक्रम का विस्तृत वर्णन मिलता है।
🔪 अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण एवं संघर्ष (1299-1301 ई.)
अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत, 1296-1316) ने रणथम्भौर पर तीन बार आक्रमण किये – 1299, 1300 और 1301 ई. में। इन आक्रमणों का मूल कारण था – अलाउद्दीन के विद्रोही सैनिक नेता मुहम्मदशाह (राजपूत अमीर) को हम्मीर देव चौहान ने शरण देना।
📜 ऐतिहासिक स्रोत: इस युद्ध का विस्तृत वर्णन ‘हम्मीर महाकाव्य’ (नयनचन्द्र सूरी), ‘हम्मीर रासो’ (जोधराज), ‘खजाइनुल फुतूह’ (अमीर खुसरो) एवं ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ में मिलता है।
🕯️ रणथम्भौर का प्रथम राजपूत साका (1301 ई.) – राजस्थान का प्रथम जौहर
11 जुलाई, 1301 ई. को रणथम्भौर दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का कब्जा हो गया। इस युद्ध में रानी रंगदेवी (पद्मिनी के समान) ने जल जौहर (सामूहिक आत्मदाह) किया। यह राजस्थान का प्रथम ऐतिहासिक साका माना जाता है, जिसमें हजारों राजपूत महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए। राजपूत योद्धाओं ने “शाका” (अंतिम युद्ध में मृत्यु) को प्राप्त किया।
रणथम्भौर की इस घटना ने पूरे राजस्थान में वीरता और बलिदान की एक नई मिसाल कायम की। बाद में चित्तौड़ (1303, 1535, 1567), जैसलमेर, रणथम्भौर आदि कई दुर्गों में इसी प्रकार के साके और जौहर हुए, लेकिन रणथम्भौर का साका सबसे प्रथम प्रलेखित साका होने का गौरव रखता है।
📚 रणथम्भौर के चौहान – साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धरोहर
📖 प्रमुख ग्रन्थ एवं अभिलेख
- हम्मीर महाकाव्य – नयनचन्द्र सूरी (जैन मुनि) – संस्कृत महाकाव्य, इसमें हम्मीर देव के 17 युद्धों और राज्य विस्तार का वर्णन।
- हम्मीर रासो – जोधराज (समकालीन कवि) – इसमें अलाउद्दीन खिलजी एवं हम्मीर के युद्ध की रोमांचक गाथा है।
- हम्मीरहठ – चन्द्रशेखर – एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ, जिसमें अलाउद्दीन और मुहम्मदशाह का प्रकरण वर्णित है।
- बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.) – चौहान वंश की उत्पत्ति के ब्राह्मण सिद्धांत का प्रमाण।
🏯 रणथम्भौर दुर्ग की प्रमुख विशेषताएँ
- यह UNESCO विश्व धरोहर (राजस्थान के छः दुर्ग) में शामिल है।
- दुर्ग के चारों ओर विशाल परकोटा, तीन प्रवेश द्वार एवं अनेक जलाशय।
- गणेश मंदिर, त्रिनेत्र गणेश मंदिर, रानी रंगदेवी का महल, जौहर स्थल आदि।
- प्राकृतिक सौंदर्य एवं वन्यजीवों के लिए भी प्रसिद्ध – यहाँ रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान बाघों के लिए विश्वप्रसिद्ध है।
📌 परीक्षा विशेष: रणथम्भौर के चौहान – संक्षिप्त रिवीजन (बोनस तथ्य)
रणथम्भौर के चौहान राजस्थान के चौहान वंश की सबसे वीर एवं संघर्षशील शाखा थी। तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद उनके पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर दुर्ग में इस शाखा की नींव रखी। बाद में वाग्भट्ट चतुर्थ ने लगभग 1240 ई. में मुस्लिम शासन से दुर्ग पुनः प्राप्त कर चौहान शासन पुनर्स्थापित किया। इस वंश के सर्वाधिक प्रतापी शासक हम्मीर देव चौहान (1282-1301 ई.) थे, जिन्होंने 17 युद्ध लड़े और 16 में विजय प्राप्त की। उन्होंने मालवा, गुजरात, मेवाड़ के शासकों को पराजित किया तथा कोटि यज्ञ करवाकर धार्मिक आस्था का परिचय दिया।
हम्मीर देव ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सरदार मुहम्मदशाह को शरण दी, जिसके कारण खिलजी ने 1299, 1300 और 1301 ई. में तीन आक्रमण किए। अंतिम आक्रमण में दुर्ग के दो विश्वासघाती सरदारों – रणमल और भीमदेव – ने अलाउद्दीन का साथ दिया। 11 जुलाई 1301 को हम्मीर देव और उनके पुत्र वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए। रानी रंगदेवी ने जल जौहर किया। यह राजस्थान का प्रथम ऐतिहासिक साका माना जाता है। इस घटना ने राजपूताने में वीरता और बलिदान की अमर मिसाल कायम की। नयनचन्द्र सूरी कृत 'हम्मीर महाकाव्य' एवं जोधराज कृत 'हम्मीर रासो' इस गौरवशाली इतिहास के प्रमुख साहित्यिक स्रोत हैं। आज रणथम्भौर दुर्ग UNESCO विश्व धरोहर है और वीर हम्मीर की गाथा लोकगीतों में अमर है।