🏰 चौहान वंश: राजस्थान के गौरवशाली राजवंश का संपूर्ण इतिहास
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🔱 चौहान वंश: उत्पत्ति के विविध सिद्धांत
चौहान वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों एवं प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्न मत प्रचलित हैं। ये सिद्धांत न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि परीक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी हैं।
🌞 सूर्यवंशी उत्पत्ति मत – कुछ प्राचीन ग्रंथ चौहान वंश को सूर्यवंशी क्षत्रियों का वंशज बताते हैं। हम्मीर महाकाव्य (नरपति नन्दन सूरी), "हम्मीर रासो (जोधराज) और पृथ्वीराज विजय (जयानक) इस मत का समर्थन करते हैं। प्रमुख विद्वान पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी चौहानों को सूर्यवंशी माना है।
🌙 चन्द्रवंशी उत्पत्ति मत – कुछ अभिलेख चौहानों को चन्द्रवंश से संबंधित बताते हैं। इनमें हांसी अभिलेख (हरियाणा) और अचलेश्वर (आबू) शिलालेख प्रमुख हैं।
🔥 अग्निकुण्ड उत्पत्ति मत (अग्निवंशी) – यह सर्वाधिक प्रचलित मत है। पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई) के अनुसार, ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया, जिससे अग्निकुण्ड से चार राजपूत वंशों – प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान – की उत्पत्ति हुई।
🕉️ ब्राह्मण वंशीय उत्पत्ति मत – कुछ ऐतिहासिक अभिलेख चौहानों को ब्राह्मण गोत्र से उत्पन्न बताते हैं, जो बाद में क्षत्रिय बने। बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.) में चौहानों को “विप्र श्रीवत्स गोत्र” कहा गया है। डॉ. दशरथ शर्मा ने इस मत का समर्थन किया है। अभिलेख के अनुसार, चौहानों के आदि पुरुष का जन्म अहिच्छत्रपुर (आधुनिक नागौर) में वत्स गोत्र में हुआ था।
🗺️ सांभर / अजमेर के चौहान (शाकम्भरी शाखा)
चौहानों की मूल शाखा शाकम्भरी (सांभर) के आसपास का क्षेत्र था, जिसे सपादलक्ष (सवा लाख गाँवों का समूह) कहा जाता था। उनकी प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी।
👑 महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177-1192 ई.)
जन्म: 1166 ई. में अन्हिलपाटन (गुजरात) में। पिता सोमेश्वर एवं माता कर्पूरदेवी (कलचुरी राजकुमारी)।
सिंहासनारोहण: मात्र 11 वर्ष की आयु में। प्रारम्भ में माता कर्पूरदेवी ने शासन संभाला, किन्तु शीघ्र ही पृथ्वीराज ने स्वयं शासन प्रबंध अपने हाथों में ले लिया।
उपाधियाँ: राय पिथौरा (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला), दल पुंगल (विश्व विजेता)।
सैनिक अभियान: आरंभ में चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह का दमन किया। 1182 ई. में महोबा के चंदेल शासक परमाल देव को पराजित किया। इस युद्ध में चंदेल वीर आल्हा-उदल वीरगति को प्राप्त हुए।
दरबारी विद्वान: जयानक (पृथ्वीराज विजय), चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो – हिन्दी का प्रथम महाकाव्य), विद्यापति गौड़, वागीश्वर आदि।
⚔️ तराइन के युद्ध (1191 एवं 1192 ई.): भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़
प्रथम युद्ध (1191 ई.) – राजपूतों की विजय
मुहम्मद गौरी ने सरहिंद (तबरहिंद) पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने आक्रमण किया। तराइन के मैदान (हरियाणा) में हुए युद्ध में दिल्ली के गवर्नर गोविन्दराज ने गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी युद्ध भूमि से भाग गया और उसकी सेना परास्त हो गई।
द्वितीय युद्ध (1192 ई.) – मुगलों का आगमन
पृथ्वीराज की जीत के बाद वह आमोद-प्रमोद में व्यस्त हो गया, जबकि गौरी ने विशाल सेना एकत्रित की। पुनः तराइन के मैदान में युद्ध हुआ। इस बार मुहम्मद गौरी की विजय हुई। पराजित पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया गया।
पृथ्वीराज रासो के अनुसार: बंदी पृथ्वीराज को गजनी ले जाया गया, जहाँ शब्द भेदी बाण के प्रदर्शन के समय उसने गौरी को मार डाला।
महत्व: तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास की युग परिवर्तनकारी घटना साबित हुआ। इससे भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य का प्रारंभ हुआ। मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक बना।
📚 प्रमुख साहित्यिक स्रोत: इस युद्ध का विस्तृत विवरण पृथ्वीराज रासो (चन्द्र बरदाई), ताजुल मासिर (हसन निजामी) एवं तबकात-ए-नासिरी (सिराज) में मिलता है।
🏞️ रणथम्भौर के चौहान एवं वीर हम्मीर देव
तराइन के युद्ध के बाद पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर में चौहान वंश की नई शाखा स्थापित की। इस शाखा के सर्वाधिक प्रतापी एवं अंतिम शासक हम्मीर देव चौहान (1282-1301 ई.) थे।
हम्मीर देव ने दिग्विजय की नीति अपनाते हुए अपने राज्य का विस्तार किया। उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सैनिक नेता मुहम्मदशाह को शरण दे दी, जिसके कारण खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया।
1301 ई. में हुए अंतिम युद्ध में हम्मीर चौहान की पराजय हुई। दुर्ग में रानी रंगदेवी ने जल जौहर किया तथा सभी राजपूत योद्धा मारे गये। 11 जुलाई 1301 को दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का कब्जा हो गया।
यह राजस्थान का पहला साका माना जाता है।
📜 प्रमुख साहित्य: हम्मीर महाकाव्य (नयनचन्द्र सूरी) – हम्मीर की दिग्विजयों का वर्णन। हम्मीरहठ (चन्द्रशेखर) – मुहम्मदशाह और अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन।
🌿 चौहान वंश की अन्य प्रमुख शाखाएँ
📌 जालौर के चौहान (सोनगरा चौहान)
नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने 1177 ई. के लगभग परमारों को पराजित कर जालौर में चौहान शासन स्थापित किया। उदयसिंह एवं कान्हड़देव प्रमुख शासक रहे। 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण किया। कान्हड़देव सोनगरा और उसके पुत्र वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध की जानकारी कान्हड़दे प्रबन्ध (पद्मनाभ) में मिलती है।
📌 हाड़ौती के चौहान (हाड़ा चौहान)
1241 ई. में हाड़ा चौहान देवा ने मीणा शासक जैता को पराजित कर बूँदी में चौहान शासन स्थापित किया। बूँदी का नाम वहाँ के शासक बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा। 1631 ई. में शाहजहाँ ने कोटा को बूँदी से स्वतंत्र कर माधोसिंह को वहाँ का शासक बनाया। कोटा के शासक भीमसिंह प्रथम (1707-1720 ई.) को कोटा राज्य का सबसे प्रभावशाली शासक माना जाता है।
📌 सिरोही के चौहान (देवड़ा चौहान)
सिरोही में चौहानों की देवड़ा शाखा का शासन था, जिसकी स्थापना 1311 ई. के आसपास लुम्बा द्वारा की गई। राजधानी चन्द्रावती थी। बाद में सहासमल ने 1425 ई. में सिरोही नगर की स्थापना की।
📌 परीक्षा विशेष: चौहान वंश – एक नजर में (बोनस तथ्य)
📚 स्रोत: राज्य पाठ्यपुस्तकें, राजपूताना गजेटियर, RAJ RAS नोट्स, प्रामाणिक ऐतिहासिक सामग्री एवं प्राचीन अभिलेख। सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी।
राजस्थान का इतिहास: चौहान वंश का गौरवशाली अध्याय
चौहान वंश राजस्थान के सबसे पराक्रमी राजपूत वंशों में से एक है। इनकी उत्पत्ति को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। 'पृथ्वीराज रासो' के अनुसार ये अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए चार राजपूत वंशों में से एक थे। वहीं बिजोलिया शिलालेख इन्हें ब्राह्मण वंश का बताता है।
चौहानों का मूल स्थान सांभर (शाकम्भरी) क्षेत्र था, जिसे 'सपादलक्ष' कहा जाता था। प्रारम्भिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। वंश के आदि पुरुष वासुदेव (551 ई.) माने जाते हैं।
इस वंश के सबसे प्रतापी शासक विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) थे, जिनका काल 'सपादलक्ष का स्वर्णयुग' कहलाता है। उन्होंने दिल्ली पर अधिकार किया, अजमेर में आनासागर झील और बीसलपुर बाँध का निर्माण करवाया।
अंतिम महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय (राय पिथौरा) ने तराइन के प्रथम युद्ध (1191) में मुहम्मद गौरी को पराजित किया किन्तु द्वितीय युद्ध (1192) में वीरगति प्राप्त की। तराइन की पराजय ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य का मार्ग प्रशस्त किया। चौहान वंश की अन्य शाखाओं ने रणथम्भौर, जालौर, बूँदी और सिरोही में शासन किया।